कविता-रेड लाइट एरिया-जिंदगी है या सजा

स्त्री अपने स्त्रीत्व को
भंग करवाती है
क्रूरता के नग्न
नृत्य का दर्शन और
प्रदर्शन सार्वजनिक रूप
धारण कर लेता है, तो
कभी अपने कलुष रहित
शरीर को खूंखार
भेड़ियों को काटने, चीरने व
फाड़ने के लिए सौंप देती हैं
कभी अपने बच्चों के खातिर
तो कभी रोटी की खातिर !

वहीं दूसरी ओर
पुरुष की संवेदनाएँ
शून्य की राह पकड़ लेती हैं
संवेगों और आवेगों के
माध्यम से, लालसा की
दृष्टिकोण से, हवस से स्त्री की
मर्यादाओं को क्षीण करने को
हर पल आतुर रहता है
साथ ही साथ वैमनस्य के
संबंधों को जमींदोज
कर देता है क्यों न करे
आखिर वह पुरुष जो है !

जमघट लगता है स्त्रियों का
जब सूरज दिन की
कछारों में जा रहा होता है
तभी सुंदरता की मापनी
सुनिश्चित करती है स्त्रियों के
कौमार्य का मूल्य ,
स्त्री हर रोज़ बिकती है,
हर घंटे बिकती है,
हर मिनट बिकती है,
यहाँ तक कि
स्त्री हर क्षण बिकती है,
बिक जाना ही उसने अपना
उद्देश्य बना लिया होता है
और तथाकथित उद्देश्य
आवश्यकता नहीं
मजबूरियाँ होती हैं
रोटी के लिए जो स्त्री को
रेड लाइट एरिया में
दाखिल करा देती हैं।

कविता – दीवारें

दीवारें महज़ बटवारा नहीं करती
कभी कभी दूसरी दुनिया की
तरफ अग्रसर कर देती हैं
दिशाओं का ज्ञान तिलिस्म
जैसा लगता है
वो सूरज वो तारे
वो चांद और उसकी चांदनी
सब कुछ रहती हैं पर
कभी एहसास नहीं होता है

ये दीवारें दूसरी दुनिया में
तो पहुंचा देती हैं
घुट घुट कर मरने के लिए,
उपचार भी होता है
अस्पताल से लेकर चिकित्सक
भी रहते हैं पर दवाई तो
तनहाई वाली ही खिलाते हैं

हमारी दुनिया के लोगों से
भरी पड़ी है दूसरी दुनिया पर
सामंजस्य स्थापित करना
बहुत ही कठिन है
दूसरों के दुःख सुन कर
समझ कर अपना दुःख
तिनका सा लगता है

सोचने समझने की क्षमता
क्षीण होने लगती है जब
मनोवृत्ति के विपरीत
जीवनयापन करना हो
स्वतंत्रता तो है ही नहीं यहाँ
पांव में बेड़ियाँ भी नहीं है
पर हम लोग गुलाम हैं
इच्छाएं मन ही मन घुटने लगती हैं
हिम्मत दम तोड़ देती हैं
दीवार की ईटों को गिनने चलिए
तो सिर के बाल गिरने लगते हैं
ये दीवारें हैं जो कभी खत्म नहीं होती।
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अरुण शर्मा ©
सर्वाधिकार सुरक्षित
29/05/2017

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